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Pepe ने जोश में लॉंच किया बच्चों का विंटर कलेक्शन, लेकिन विज्ञापन में कूट-कूट कर भरा लैंगिक भेदभाव Pepe-Sexist-Winter-collection/



एक ऐसे समय में, जब देश में जेंडर स्टीरियोटाइप्स के खिलाफ सोशल मीडिया पर काफी कुछ कहा लिखा जा रहा है, पेपे जैसे मशहूर ब्रांड ने एक सेक्सिट विज्ञापन छापा है, जिसकी काफी किरकिरी हो रही है. पेपे ने बच्चों के लिए विंटर कलेक्शन लॉन्च करते हुए एक तस्वीर छापी है. यह तस्वीर एक लड़की है जो मेकओवर से पहले हाथ में बॉल लिए मुस्कुरा रही है और 'मेकओवर' के बाद दूसरी तस्वीर में वो अब एक 'आदर्श बच्ची' के रुप में तब्दील हो चुकी है.

हालांकि तस्वीर से साफ जाहिर है कि पहली फोटो में बच्ची खुश है, आत्मविश्वास से भरी हुई है लेकिन दूसरी तस्वीर में बॉल से दूर, सकुचाए तरीके से बैठते हुए केवल मुस्कुरा भर दे रही है. आखिर क्यों उसे दूसरी तस्वीर में बॉल से दूरी बनाने दिया गया है? क्या मेकओवर के नाम पर इस बच्ची को टाइपकास्ट नहीं किया जा रहा है? क्या ब्रांड चमकाने की इस अंधी दौड़ में बच्चों को भी नहीं झोंकने की कोशिश तो नहीं है?
इसमें कोई दो राय नहीं कि अपने समाज में जेंडर स्टीरियोटाइप्स आज भी मजबूती से जड़ें जमाए हुए है. खाना बनाने का काम केवल महिलाओं का होता है या असली मर्द कभी रोता नहीं है जैसे तमामों - तमाम स्टीरियोटाइप्स बरसों से लोगों के दिमाग में रचे-बसे हुए हैं. डियो से लेकर बैंक तक के कई विज्ञापनों में सेक्सिम और स्टीरियोटाइपिंग के कई उदाहरण आपको मिल जाएंगे.
स्टीरियोटाइप अक्सर नेगेटिव की श्रेणी में आता है. जब आप किसी को स्टीरियोटाइप करते हैं तो आप उनके बारे में बिना जाने ही राय बनाते हैं जो अकसर गलत होती है क्योंकि हर इंसान एक दूसरे से अलग तरीके से सोचता है और अलग तरीके से परिस्थितियों पर प्रतिक्रियाएं देता है. हाल ही में रियो ओलंपिक में देश के लिए पदक लाने वाली साक्षी मलिक और पी वी सिंधु के मां बाप ने भी साबित किया है कि जेंडर स्टीरियोटाइप्स की परवाह किए बगैर आप अगर अपने बच्चों के सपने को पूरा करने में उनकी मदद करेंगे, तो यकीनन वे बेहतर प्रदर्शन करने में कामयाब होंगे.
बच्चे मन के सच्चे होते हैं. उन्हें आप जिस सांचे में ढाल दो वो उसी में तब्दील होते चले जाते हैं. सभी जानते हैं कि बचपन जिंदगी में वो समय होता है जब आप पूरी बेफ्रिकी के साथ अपनी जिंदगी जीते हैं, इस समय आप चीजों को लेकर जिज्ञासु होते हैं और तमाम तरह की गतिविधियों में भी शामिल होते हैं, ऐसे में ये अभिभावकों की भी जिम्मेदारी बनती है कि उनकी मासूमियत को ब्रांड, पाउट और आदर्श बच्चे के ठप्पे से मुक्त करने की हर संभव कोशिश की जाए.

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